हर मोर्चों पर लड़ी लड़ाई, वीरता, शहादत और शौर्य की दास्तां है कारगिल विजय दिवस

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नई दिल्ली

कारगिल युद्ध में भारत को मिली जीत के 22 साल पूरे होने की खुशी में देशभर में जश्न का आगाज हो गया है। कारगिल युद्ध (Kargil Vijay Diwas) पाकिस्तान के धोखे (Kargil War Between India and Pakistan) और भारतीय सैनिकों के शौर्य की गाथा (Reasons Behind Kargil War) है। सैनिकों ने जिस वीरता से लड़ाई लड़ी उसी बहादुरी से सेना के डॉक्टर और मेडिकल टीम ने हर मोर्च पर उनका साथ दिया।

कर्नल विजय कुमार उस वक्त यंग कैप्टन थे। श्रीनगर - लेह हाइवे के पास वे एक इंफेंट्री बटालियन में रेजिमेंटल मेडिकल ऑफिसर के पद पर तैनात थे। 8 मई 1999 को उन्हें मैसेज मिला कि उनकी यूनिट को द्रास सेक्टर मूव करना है जहां से पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ना है।

दुश्मन की तरफ से शुरू हो गई भारी गोलाबारी

कर्नल विजय बताते हैं कि जब उनकी कंपनी लाइन ऑफ कंट्रोल की तरफ मूव कर रही थी तब दुश्मन की तरफ से भारी गोलाबारी शुरू हो गई। इसमें कई सैनिक जख्मी हो गए। एक सैनिक को दोनों हाथ गंवाने पड़े और खून लगातार बह रहा था। सैनिक बेहोश हो गया था।

दोनों हाथों से लगातार बह रहा था खून

कर्नल विजय और उनकी टीम ने सैनिक को एक चट्टान के पीछे शिफ्ट किया ताकि दुश्मन की तरफ से हो रही गोलाबारी से कवर मिल सके। दुश्मन को भारतीय सैनिक भी मुंहतोड़ जवाब दे रहे थे। सबसे पहले दोनों हाथों से लगातार बहते खून को रोकना था।

एयरलिफ्ट करके पहुंचाया गया सर्जिकल सेंटर

कंप्रेशन बैंडेज से इसे रोका गया और फिर आईवी फ्लूड चढ़ाया गया। किसी तरह गोलाबारी से बचाते हुए सभी जख्मी सैनिकों को स्ट्रेचर पर रखकर सड़क तक पहुंचाया गया और फिर वहां से एंबुलेंस में आगे ले गए। बुरी तरह जख्मी सैनिक को एयरलिफ्ट कर फॉरवर्ड सर्जिकल सेंटर पहुंचाया गया और अपनी विलपावर और युद्ध के मैदान में वक्त पर मिली मेडिकल सहायता से उसकी जान बचाई जा सकी।

'जज्बातों पर काबू पाते हुए निभाई जिम्मेदारी'

कर्नल विजय कहते हैं कि मुझे अपनी यूनिट की उपलब्धियों पर गर्व है, साथ ही कहते हैं कि वह वक्त उनके लिए एक तरह से भावनाओं का तूफान था और सारे जज्बातों पर काबू पाते हुए अपनी जिम्मेदारी निभानी थी। उन्हें सेना मेडल से सम्मानित किया गया।

जब चट्टान पर आ गिरा दुश्मन की तोप का गोला

सेना में डॉक्टर कर्नल राजेश अधौ कारगिल युद्ध के दौरान कैप्टन थे। वह कहते हैं कि पॉइंट 5140 की लड़ाई के दौरान हम चढ़ाई चढ़ रहे थे। जब मैं बुरी तरह थक गया और एक चट्टान के पीछे रुकना चाहता था तब मेरे सेकंड इन कमांड लेफ्टिनेंट कर्नल वाईके जोशी (जो अब लेफ्टिनेंट जनरल हैं) ने मुझे रुकने से मना किया और आगे की तरफ धक्का दिया। हम करीब 50 मीटर ही आगे गए थे कि दुश्मन का एक गोला आकर उसी चट्टान पर गिरा जिसमें मैं रुकना चाहता था।

जवान बोला-दुश्मन से लड़ना ही मेरा धर्म है

वह बताते हैं कि युद्ध के दौरान जब मैं तोलोलिंग कॉम्प्लेक्स में था तब मेस स्टाफ के एक जवान से बात की जिसकी कुछ वक्त पहले ही शादी हुई थी। मैंने जवान से पूछा कि वह फ्रंटलाइन क्यों जॉइन कर रहा है, जबकि उसे एडमिनिस्ट्रेटिव पार्टी में होना चाहिए। जवान ने जवाब दिया कि दुश्मन से लड़ना ही मेरा धर्म है।

...और जब उसी जवान शहीद होने की मिली खबर

दो घंटे बाद ही मुझे एक कॉल आई कि मेरी यूनिट में एक जवान शहीद हो गया है। यह यूनिट की पहली कैजवल्टी थी। यह वही जवान था जिससे मेरी बात हुई थी। यह सुनकर मैं सन्न रह गया था। कई जख्मी सैनिकों का इलाज किया और कई की जान बचाई जा सकी तो कई सैनिकों को खोया भी। कर्नल अधौ को सेना मेडल से सम्मानित किया गया।

ऐसे बची 150 सैनिकों की जान

कर्नल वीवी शर्मा भी उस वक़्त कैप्टन थे और रेजिमेंट मेडिकल ऑफिसर थे। युद्ध में घायल सैनिकों को वक्त पर मेडिकल हेल्प मिल सके इसलिए उन्होंने अपनी रेजिमेंट एड पोस्ट को बेटल फील्ड के काफी करीब शिफ्ट कर लिया। इससे घायल सैनिकों को जल्दी निकालने में मदद मिली। उस वक्त एक एक मिनट कीमती होता है और बैटल फील्ड के काफी करीब होने से करीब 150 घायल सैनिकों की जान बचाई जा सकी। कर्नल शर्मा भी सेना मेडल से सम्मानित किए गए।

हर मोर्चों पर लड़ी लड़ाई, वीरता, शहादत और शौर्य की दास्तां है कारगिल विजय दिवस